मैं लॉकडाउन का समर्थन करूँगा सिर्फ मुझे जिंदा रहने दो…,पढ़े एक आम जनता की आवाज़

अब तो कुछ सोचो •
हम किससे दिल लगा बैठे थे ?

जिस सरकार के पास 20 हजार करोड़ केवल संसंद भवन निर्माण के लिए मौज़ूद हैं उस सरकार को इतनी दान की क्यूँ ज़रूरत पड़ रही हैं?? क्यूँ 1.39 बिलियन आबादी वाले देश में आज शाशन प्रशासन असहाय नज़र आने लगा? शायद इसलिए कि… हमने कभी दूर दृष्टि रखी ही नहीं । हमने आगामी चुनौतियों को नज़रंदाज़ कर केवल अच्छे का सोच रखा था! हमें मंदिर मस्जिदों के फैसले सुहावने लगते और 3 हज़ार करोड़ की मूर्तियाँ देश की शान लगती थी। हमें सरकार के पेश किये गये बजट से कोई मतलब ही नहीं थी और देश के प्राइवेटाईजेशनो से तो दिल लगा बैठे थे।

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हजार करोड़ की शान
देश को क्या सोचने की आवश्यकता हैं ?

देश में कोरोना महामारी को लेकर बड़ी असुविधाजनक तथ्य सामने आने लगे हैं, शासन की व्यवस्थाये ध्वस्त हो चुकीं हैं वही प्रशासन भी अपने ज्ञानो से वंचित होता नज़र आ रहा हैं। दक्षिण एशिया के तीन प्रायद्वीपों में यह देश अपने 32,87,263 वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा साथ ही लगभग 2.3 अरब जनसंख्या के साथ दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश भी है।

ऐसे स्थिति में यह देश उस बीमारी से लड़ रहा हैं जिसके आंकड़ो का कोई सही जवाब नहीं हैं। जिसके आंकड़े प्रत्येक दिन इमारतो की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं। जहाँ 3 हज़ार करोड़ की मूर्ति ना बनती तो शायद हम आज देश की अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य नीतियों पर असहजता से भरोषा कर रहे होते। लेकिन अब किस पर भरोषा करें? देश को इस पर सोचने की आवश्यकता हैं! कि उन्हें देश के लिए क्या चाहिए और क्या नहीं!

कौन हैं असली मददगार सरकार या कोई और?

हिंदुस्तान में करोड़ो मन्दिर और उनमे छुपे करोड़ो अरबो रुपयें आखिर कब काम आएंगे? शायद अब आयेंगे ही नहीं! जिन रुपयों को हम जिंदगियां बचाने के उपयोग में नहीं ला सकें अब वह किन कामों के? देश का पैसा अमीरों के पास सुरक्षित हैं लेकिन गरीबों का अभी और गरीब होना बाकी हैं। जहाँ सरकार अरबो रुपयों की मालिक होते हुए भी इस सिस्टम को नहीं संभाल पाई वही सोनू सूद जैसे एक आम अभिनेता ने जाने कितने लाखो लोगो की जिंदगियां बचा ली! न जाने कितने NGOS ने स्वयं के पैसो से कितनो की साँसे रुकने से बचा लिए।

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ट्रिब्यूट to सोनू सूद
मज़दूर हिंदुस्तान का सबसे मज़बूर!

देश का नींव, देश का कृषक आज कण कण का मोहताज़ हैं। आज इनके पास खाने को एक वक्त की रोटी नहीं हैं। वह देश के सरकार से चीख-चीख कर कह रहा हैं – मैं लॉकडाउन का समर्थन करूँगा सरकार पहले मुझे जिंदा तो रहने दो…! वैसे भी मुझे बिजली बिल, पानी बिल, बच्चो का स्कूल फीस, किरायेदार का किराया, बैंक का लोन ही तो केवल चुकाना हैं कौन सा बड़ा काम हैं…! चूका लूँगा यह भी।

भविष्य के फैसले वर्तमान में ही ले लो…

कोरोना ने जहाँ देश की लुटिया डूबा दी वही हमें सोचने में भी मजबूर कर दिया हैं कि देश में पैसों की कमी नहीं हैं पर जरुरत हैं तो देश में अच्छी शिक्षा, सुद्रढ़ स्वास्थ्य निति और परिपक्त योजनाओं की! सरकार के संग जनताओ को भी विचार मंथन की आवश्यकता हैं कि…. उनके देश का पैसा किन किन किस्तों और कितनी कितनी मुश्तो में इन्वेस्ट होना चाहिए! क्यूंकि सुना हैं आज कल भगवानो ने भी अपने मंदिरो के कपाट बंद कर लिए हैं….

शुभम कोसले, मुख्य संपादक, गोल्डन छत्तीसगढ़ की कलम से!

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